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Monday, 30 March 2015

अंतिम पड़ाव

”जीवन-यात्रा के इस अंतिम पड़ाव तक आपको विदा देने आई हूँ बाबूजी! आपने अपनी इहलोक की यात्रा अपूर्व आत्मविश्वास और साहस के साथ पूर्ण की है। विश्वास है परलोक की यात्रा आपकी निरापद होगी।“ हाथ जोड़, बाबूजी को अंतिम प्रणाम कर मिन्नी चिता से दूर हट आई थी।
चिता के बाहर से बाबूजी के दो पांव भर दिख रहे थे, उनका पूरा शरीर मोटी-मोटी लकड़ियों से ढक दिया गया था। अचानक पानी की बौछार पड़ने लगी।